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वट सावित्री पूर्णिमा क्या है?
वट सावित्री पूर्णिमा (जिसे वट पूर्णिमा या सावित्री व्रत भी कहा जाता है) एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है जिसे विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए मनाती हैं। यह व्रत दो तरीकों से मनाया जाता है:
- उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा) में इसे ज्येष्ठ अमावस्या को सावित्री व्रत के रूप में मनाया जाता है।
- पश्चिमी और दक्षिणी भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा) में यह ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है।
2025 में वट सावित्री पूर्णिमा की तारीखें
- उत्तर भारत (अमावस्या):
📅 26 मई 2025 (सोमवार)
🕐 अमावस्या तिथि: 26 मई दोपहर 12:11 बजे से 27 मई सुबह 8:31 बजे तक - पश्चिमी/दक्षिणी भारत (पूर्णिमा):
📅 10 जून 2025 (मंगलवार)
🕐 पूर्णिमा तिथि: 10 जून 1:05 बजे रात से 11 जून 2:43 बजे रात तक
वट सावित्री की कथा
यह कथा महाभारत के वन पर्व से ली गई है, जिसमें सावित्री और सत्यवान की अमर प्रेम कहानी है। सावित्री, राजा अश्वपति की पुत्री थीं। उन्हें जब सत्यवान से प्रेम हुआ, तब भी उन्होंने विवाह किया जबकि उन्हें पहले ही ज्ञात था कि सत्यवान एक वर्ष में मृत्यु को प्राप्त होगा।
जब सत्यवान की मृत्यु वट (बड़) वृक्ष के नीचे हुई, सावित्री ने यमराज का पीछा किया और उनका सामना किया। अपनी बुद्धिमानी से पहले अपने ससुर की दृष्टि और राज्य मांगा, फिर सौ पुत्रों का वरदान—जिसके कारण यम को अंततः सत्यवान का जीवन लौटाना पड़ा। यमराज ने सावित्री की अटल निष्ठा और प्रेम से प्रभावित होकर उसे आशीर्वाद दिया।
महत्त्व और प्रतीकात्मकता
- वट वृक्ष (बड़ का पेड़):
- यह दीर्घायु, शक्ति और वैवाहिक स्थिरता का प्रतीक है।
- विवाहित महिलाएं इसके चारों ओर कच्चे सूत (धागे) से 7, 21 या 108 बार सूत बांधती हैं, जो अनंत वैवाहिक बंधन का प्रतीक है।
- व्रत और पूजा: स्त्रियां बिना जल और अन्न के उपवास करती हैं और वट वृक्ष की पूजा करती हैं, अपने पति की लंबी आयु और स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं।
व्रत की विधि और पूजा प्रक्रिया (Puja Vidhi)
- प्रातःकाल स्नान: शरीर और मन को पवित्र करें।
- लाल या पीले वस्त्र धारण करें: यह वैवाहिक सौभाग्य का प्रतीक है—पारंपरिक वस्त्र, गहने आदि पहनें।
- वट वृक्ष की पूजा:
- वृक्ष के आसपास का स्थान स्वच्छ करें। सत्यवान–सावित्री–यमराज या देवी-देवताओं की मूर्तियाँ/चित्र रखें।
- फल, मिठाई, फूल, नारियल, धूप आदि अर्पित करें।
- कच्चे धागे से वृक्ष की परिक्रमा करें (7/21/108 बार) और बांधें।
- परिक्रमा: वृक्ष की घड़ी की दिशा में परिक्रमा करते हुए प्रार्थना करें।
- व्रत कथा का श्रवण या पाठ: “वट सावित्री कथा” का पाठ करें या सुनें।
- दान: ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को दान देना शुभ माना जाता है।
- व्रत का पारण: शाम को पूजा के बाद व्रत समाप्त करें।
स्थानीय रंग और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति
- महाराष्ट्र में महिलाएं मंदिरों या पेड़ों के पास एकत्र होती हैं, पारंपरिक पोशाकों में सजती हैं, प्रसाद बाँटती हैं और चर्चा करती हैं।
- 2025 की नई परंपराएं: महिलाएं अब साड़ी, गहने, पूजा थाली या स्पा वाउचर जैसी चीजें उपहार में देती हैं!
- कुछ क्षेत्रों में मनोरंजक परंपराएं भी हैं: जैसे कौन सबसे जल्दी धागा बांधता है, या यमराज और सावित्री की कहानी पर आधारित लोकगीतों का गायन।
कम जानी-पहचानी लेकिन रोचक बातें
- ‘सावित्री’ नाम वैदिक सूर्य देवता ‘सवित्र’ से आता है, जिसका अर्थ है “जो जीवन देता है”।
- कुछ मान्यताओं के अनुसार वट वृक्ष में भगवान ब्रह्मा जी, भगवान श्री विष्णु जी और भगवान शिव जी तीनों देवताओं का वास होता है।
- ओडिशा और मिथिला में इसी तरह के व्रत में महिलाएं चक्की या घर के वस्तुओं की पूजा करती हैं, जो सावित्री का प्रतीक मानी जाती हैं।
- इस कथा ने कला और साहित्य को भी प्रेरित किया—होल्स्ट का चैंबर ओपेरा, अरविंदो की महाकाव्य कविता, यहां तक कि 1995 की कुछ पॉप गीतों में भी इसका संदर्भ मिला है।
यह आज भी क्यों प्रासंगिक है?
- यह स्त्रियों की धैर्य, शक्ति और प्रेम का प्रतीक है।
- परिवार को एक सूत्र में बाँधने वाला पर्व है—जिसमें पीढ़ियां मिलती हैं, कहानियां सुनती हैं।
- आज के युग में भी यह श्रद्धा, सेवा, भक्ति और रिश्तों की अहमियत बताता है।
लेख सारांश
वट सावित्री पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसमें गहरी परंपरा, प्रेरणादायक पौराणिक कथा और आधुनिक सामाजिक गर्मजोशी मिलती है। चाहे वह अमावस्या हो या पूर्णिमा, इसका मूल संदेश एक ही है: एक पत्नी का अडिग प्रेम मृत्यु को भी पराजित कर सकता है। वट वृक्ष की पूजा, उपवास, कथा वाचन और सामूहिकता के जरिए महिलाएं पूरे भारत में अपने वैवाहिक प्रेम को श्रद्धा और बुद्धिमानी से सम्मान देती हैं।







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