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कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त तीन-सदस्यीय तथ्य-जांच समिति ने निष्कर्ष निकाला है कि 11-12 अप्रैल को मुर्शिदाबाद में हुई भीड़ की हिंसा विशेष रूप से हिंदू निवासियों को निशाना बनाकर की गई थी, जबकि स्थानीय पुलिस इस हमले के अहम घंटों के दौरान पूरी तरह से निष्क्रिय और अनुपस्थित रही। रिपोर्ट में आगे यह आरोप लगाया गया है कि स्थानीय तृणमूल कांग्रेस पार्षद महबूब आलम ने इस हिंसा को वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 के खिलाफ विरोध के नाम पर योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया। इस अशांति में तीन लोगों की पुष्टि की गई मौत हुई—जिनमें एक पिता-पुत्र शामिल हैं—10 से अधिक लोग घायल हुए और 400 से अधिक हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा, जिन्होंने भागीरथी नदी पार कर मालदा जिले में शरण ली। इस घटना के बाद राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है, भाजपा ने ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी सरकार पर सांप्रदायिक पक्षपात और लापरवाही का आरोप लगाया है, वहीं टीएमसी ने इस त्रासदी का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। इस बीच, एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया है और कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य और केंद्र दोनों को निर्देश दिया है कि वे सभी समुदायों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें।
पृष्ठभूमि: वक्फ संशोधन विधेयक और स्थानीय तनाव
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025
मार्च में भारतीय संसद द्वारा पारित वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और हस्तांतरण को सुव्यवस्थित करना था। लेकिन पश्चिम बंगाल में इसका तीव्र विरोध हुआ, जहां अल्पसंख्यक समुदायों की भूमि के पुनर्वितरण को लेकर आशंकाएं उठीं। विरोधियों का कहना था कि यह कानून धार्मिक ट्रस्टों पर स्थानीय नियंत्रण को कमजोर करेगा, जिसके चलते अप्रैल की शुरुआत तक मुर्शिदाबाद जिले में विरोध प्रदर्शन फैल गए।
बढ़ते सांप्रदायिक तनाव
सोशल मीडिया पर इस विधेयक को अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमले के रूप में प्रचारित किया गया, जिससे विशेष रूप से बेतबोना, धूलियन, सुत्ती और शमशेरगंज ब्लॉकों में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया—जहां हिंदू और मुस्लिम समुदाय सदियों से साथ रहते आए हैं। स्थानीय टेलीग्राम समूहों में “विरोध मार्च” की अपीलें प्रसारित हुईं, जिन्हें जांच समिति की रिपोर्ट के अनुसार, हिंसक तत्वों ने अपने कब्जे में ले लिया और इनका उपयोग हिंदू घरों को निशाना बनाने के लिए किया गया।
घटना विवरण: 11–12 अप्रैल की मुर्शिदाबाद हिंसा
घटनाक्रम का सिलसिला
11 अप्रैल को दोपहर लगभग 2:30 बजे, पार्षद महबूब आलम के नेतृत्व में एक भीड़ ने बेतबोना गांव पर धावा बोला। उन्होंने व्यवस्थित रूप से हिंदू परिवारों की दुकानों को लूटा और घरों में आग लगा दी। चश्मदीदों के अनुसार, हमलावरों ने पहले हिंदू घरों को चिह्नित किया, फिर रॉड और भीड़ के बल से दरवाजे तोड़े और पत्थर व पेट्रोल बम फेंकने लगे, जिससे लोग जान बचाकर भागे। यह हिंसा रातभर में पास के धूलियन तक फैल गई, जहां दो मंदिरों में आग लगा दी गई और एक सामुदायिक केंद्र को क्षतिग्रस्त कर दिया गया।
मानवीय क्षति
इस हमले में तीन लोगों की मौत हुई: संजय रॉय (45) और उनके बेटे अरिंदम रॉय (18) की घर में आग लगने से मौत हो गई, जबकि 17 वर्षीय इज़ाज़ अहमद शेख की गोली लगने से मौत हुई। दर्जनों लोग घायल हुए, जिनमें से कई को गोलियां लगीं और कुछ को जलने की चोटें आईं। बुजुर्ग महिलाएं दूसरी मंजिल से कूद गईं ताकि जान बच सके। 400 से अधिक हिंदू विस्थापितों ने भागीरथी नदी पार कर मालदा जिले में शरण ली, जहां स्कूलों को अस्थायी राहत शिविरों में बदला गया।
पुलिस की निष्क्रियता और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
तथ्य-जांच रिपोर्ट के निष्कर्ष
हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त समिति ने स्थानीय पुलिस की “पूरी निष्क्रियता और अनुपस्थिति” के लिए उन्हें फटकार लगाई। रिपोर्ट में बताया गया कि हिंसा के दौरान किए गए कई आपातकालीन कॉल का कोई जवाब नहीं मिला, क्योंकि अधिकारी उप-मंडल मुख्यालय में ही रुके रहे। समिति ने जो सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा की, उसमें यह देखा गया कि पुलिसकर्मी हमले से पहले गश्ती वाहनों को छोड़कर भाग गए और हिंसा खत्म होने तक वापस नहीं लौटे।
प्रशासनिक कदम
हिंसा के बाद राज्य सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 लागू कर दी, अफवाहों को रोकने के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं, और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को स्थानीय बलों के साथ तैनात किया गया। पश्चिम बंगाल पुलिस ने नौ-सदस्यीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया है, जो अपराधियों के खिलाफ तेज़ गति से कानूनी कार्रवाई करेगा।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आरोप
भाजपा के आरोप
भारतीय जनता पार्टी ने इस घटना को “हिंदू-विरोधी बर्बरता” बताया, टीएमसी नेताओं पर तत्काल कार्रवाई की मांग की और राज्य में राज्यपाल शासन लागू करने की अपील की ताकि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो सके। केंद्रीय गृह मंत्री को इस मामले पर जानकारी दी गई है, और भाजपा ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वह इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएगी।
टीएमसी का बचाव
तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा पर इस त्रासदी का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हमलों की निंदा की, सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की, और यह स्पष्ट किया कि जब तक सभी पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती, राज्य सरकार वक्फ संशोधन अधिनियम लागू नहीं करेगी।
ज़मीनी हकीकत और मानवीय किस्से
अराजकता में साहस
इस हमले के दौरान कई हिंदू परिवारों ने मिलकर अपने पड़ोसियों के घरों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखला बनाई, और भाग रहे मुस्लिम पड़ोसियों को खाना-पानी देकर सहायता की। भयावहता के बीच एक हल्का-फुल्का पल तब आया जब स्थानीय चायवाले सुरेश पटेल ने भागीरथी नदी के किनारे एकत्रित सभी लोगों को मुफ्त मसाला चाय पिलाई और मजाक में कहा, “दंगाइयों को भी तो चाय की जरूरत होती है, तभी तो फिर से तोड़फोड़ कर सकें!”
सामुदायिक एकता
स्थानीय एनजीओ और मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने राहत काफिले का आयोजन किया, जिनमें कंबल और दवाएं शामिल थीं। इन्हें अस्थायी राहत शिविरों में रह रहे हिंदू परिवारों तक पहुंचाया गया, जिससे यह साबित हुआ कि जमीनी स्तर पर भाईचारा अभी भी जीवित है।
घटना के बाद की स्थिति और जांच की प्रगति
न्यायिक निगरानी
कलकत्ता हाई कोर्ट ने SIT और राज्य सरकार से हर पंद्रह दिनों में गिरफ्तारी और अभियोजन की प्रगति रिपोर्ट मांगी है, और चेतावनी दी है कि अगर समयसीमा नहीं मानी गई तो अवमानना की कार्यवाही होगी। अब तक 300 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और कम से कम 60 एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिनमें दंगा, आगजनी और हत्या के प्रयास जैसे आरोप शामिल हैं।
मेल-मिलाप की राह
मुर्शिदाबाद के जिला मजिस्ट्रेटों ने “शांति समितियों” का गठन किया है, जिनमें स्थानीय बुजुर्ग, पंचायत सदस्य और युवा नेता शामिल हैं। इनका उद्देश्य हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच संवाद को बढ़ावा देना और दीर्घकालिक सांप्रदायिक सौहार्द सुनिश्चित करना है।
ज्ञात और कम ज्ञात तथ्य
- हिंसा के कारण निमतिता स्टेशन पर 48 घंटे तक ट्रेन सेवाएं बाधित रहीं, जिससे दैनिक यात्री और व्यापारी फंसे रहे।
- स्वास्थ्य विभाग द्वारा 10 घायलों की आधिकारिक पुष्टि की गई है, लेकिन स्थानीय क्लीनिकों ने अतिरिक्त 15 अनौपचारिक मामलों का इलाज किया।
- सरकारी सर्वेक्षणों के अनुसार, संपत्ति (घरों, दुकानों और मंदिरों) को हुए कुल नुकसान का मूल्य ₹5 करोड़ से अधिक आंका गया है।







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