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भारत का सोने के प्रति प्रेम और इसकी भावनात्मक कहानी
भारत के लगभग हर परिवार की एक बहुत ही जानी-पहचानी कहानी होती है। हमारी दादियां और माताएं दिवाली, धनतेरस जैसे त्योहारों या शादियों के समय सोने के गहने बड़ी सावधानी से खरीदती हैं और फिर उन्हें लाल रंग के मखमली कपड़े में लपेट कर रख देती हैं। वह छोटा सा मखमली बंडल फिर एक भारी लोहे की तिजोरी या किसी महंगे बैंक लॉकर के अंदर कैद हो जाता है, और कई दशकों तक बस वहीं पड़ा रहता है। हम उसकी चमक निहारने के लिए साल में बस एक बार उसे निकालते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वर्तमान में 20,000 से अधिक टन का यह बेशकीमती पीला धातु भारतीय घरों और मंदिरों में बिल्कुल खामोशी से सो रहा है? सोने का यह विशाल पहाड़ ऐतिहासिक रूप से बहुत समृद्ध है लेकिन वित्तीय दृष्टिकोण से “निष्क्रिय” (Dead) है। कैसा होगा अगर, बैंक को लॉकर फीस चुकाने के बजाय, बैंक आपका सोना सुरक्षित रखने के लिए हर साल आपको ही पैसे देने लगे?
‘डेड एसेट्स’ से कमाई का इंजन बनने तक का सफर
कई दशकों तक लाखों भारतीयों ने सोने को अपने सबसे सुरक्षित वित्तीय जाले के रूप में बहुत पसंद किया है, लेकिन जब तक आप अपनी अलमारी में रखे इस ठोस (physical) सोने को बेच नहीं देते, तब तक यह आपको जीरो रिटर्न देता है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अपना पूरा ध्यान उपयोग न होने वाले सोने के इस विशाल खजाने की तरफ लगा रहा है। आपके शांत ज्वेलरी बॉक्स को पैसों के एक बहते झरने में बदलने के लिए सरकार बहुत गर्व के साथ ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम’ (GMS) पर ज़ोर दे रही है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण RBI पॉलिसी आम जनता को मौका देती है कि वे बैंक में अपने निष्क्रिय पड़े हुए आभूषणों, सिक्कों, या बिस्कुट (Raw bars) को रजिस्टर्ड बैंकों में जमा करें और तय ब्याज दर पर एक वास्तविक और स्थायी कमाई शुरू करें। कुल मिलाकर, यह आपके सोने को एक ठहरी हुई संपत्ति से हटाकर ‘स्मार्ट गोल्ड इन्वेस्टमेंट’ में बदल देती है।
गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम (GMS) असल में है क्या?
मान लीजिए कि आपने बैंक में अपना फिक्स्ड डिपॉजिट अकाउंट खुलवाया है, लेकिन नोटों के बंडल के बजाय आपने सोने के कुछ सिक्के या सोने की छड़ें वहां थमा दी हैं। जब आप अपना सोना पूरी सुरक्षा के साथ बैंक को देते हैं, तो सबसे पहले आप इसके चोरी होने के उस लगातार तनाव से मुक्त हो जाते हैं। इसके साथ ही बैंक में चुकाया जाने वाला हर साल का महंगा लॉकर चार्ज भी बच जाता है। ऊपर से, आपके डिपॉजिट किए गए कुल वजन और उसके शुद्धपन के अनुसार आपको हर वर्ष ब्याज भी मिलने लगता है। इस योजना का सबसे बेहतरीन पहलू यह है कि इस स्कीम से कमाई गई राशि को आयकर या संपत्तिकर की सख्त नियमों से पूरी तरह छूट मिलती है! मतलब इस कमाई पर आपको कोई ‘कैपिटल गेन्स टैक्स’ बिल्कुल नहीं देना पड़ता है।
ब्याज दरें, श्रेणियां, और मुख्य नियम
यह शुरुआत करने के लिए आपका कोई बड़ा धनवान व्यक्ति होना भी कतई जरूरी नहीं है। कोई भी साधारण व्यक्ति केवल 10 ग्राम ठोस सोने से इस गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम का भरपूर फायदा ले सकता है। सारे इन्वेस्टर्स को थोड़ी छूट और आराम देने के लिए योजना के डिपॉजिट पीरियड को 3 स्पष्ट समयसीमा में बाँटा गया है:
- शार्ट टर्म बैंक डिपॉजिट (SRBD): 1 से 3 वर्षों के बीच के लिए। यह पूरी तरह बाज़ार और स्वयं बैंक के निर्णय पर तय होता है कि वे आपको इस श्रेणी में कितने प्रतिशत रिटर्न देना चाहते हैं।
- मीडियम टर्म डिपॉजिट (MTGD): इसे 5 से लेकर 7 वर्षों के समय के लिए बनाया गया है। इसमें डिपॉजिट करने वाले निवेशक को हर वर्ष करीबन 2.25% का फिक्स्ड रिटर्न जुड़ता हुआ मिलता है।
- लॉन्ग टर्म डिपॉजिट (LTGD): ये अवधि लगभग 11 से लेकर 15 साल के लम्बे दौर के लिए है जहाँ निवेशक अपनी कमाई को बढ़ाते हुए प्रति वर्ष औसतन 2.50% की लगातार वृद्धि प्राप्त करते हैं।
नियमों में बड़े बदलाव (Revamp) करने का निर्णय RBI ने क्यों लिया?
शुरुआत में, सोने की शत-प्रतिशत शुद्धता जाँचना लोगों को एक पहेली सुलझाने के सामान बड़ा उलझाऊ और पेचीदा लगता था। लोग कलेक्शन सेंटरों के थकाऊ चक्कर काट-काटकर अपने महंगे जेवर भेजने में बुरी तरह घबराते थे। इन्हीं दिक्कतों को पूरी तरह समझकर RBI ने अपने तरीकों को एकदम आसान बनाया है ताकि समाज के लोगों की इस बारे में जानकारी बढ़ सके। इस वक्त वे (CPTCs) नाम के स्वीकृत जांच केन्द्रों की संख्याओं को भी बहुत तेजी से गुणा करते हुए बढ़ा रहे हैं और बैंक की बड़ी व्यवस्थाओं को पीछे के इस मुश्किल काम को सम्हालने की अनुमति भी दी जा रही है। इसका मुख्य मकसद परिवारों को डर के उस ‘लॉकर रूम’ से शांतिपूर्वक बाहर निकाल कर उन्हें सरल मुनाफा दिलवाना है।
बड़े तौर पर यह भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव डालेगा?
भारत की चमकते हुए जेवरों की जो इतनी गहरी मांग है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी बड़ी कीमत हम सबको चुकानी पड़ती है। हमारा देश इस वक्त बाहर से सबसे ज्यादा ‘गोल्ड इम्पोर्ट’ ट्रेड के ज़रिए पूरे भारत की मांग को भारी दाम चुकाकर पूरा करता है। जब यही आम नागरिक हजारों टन के हिसाब से यह निष्क्रिय पड़े अपने घरों का पीला धातु भारत की अपनी मार्केट में डाल देंगे तो सोने का विदेशी आयात काफी तेजी से कम होता हुआ दिखने लगेगा। इसी के प्रत्यक्ष फलस्वरुप हमारा वो बहुत सारा पैसा (डॉलर्स के रूप में) विदेशी सीमाओं की ओर बहना रुक जाएगा जो अब हमारे मुश्किल दौर में जा रहे ‘करेंट अकाउंट डेफिसिट’ (CAD) पर कड़ी पकड़ बना सकेगा। ये सामान्य सी टीम-वर्क की तरह सीधा काम करता है; घाटा जब तेजी से गिरेगा तो वह वैश्विक मंच पर सीधे डॉलर के विपरीत भारतीय रुपये को भारी शक्ति प्रदान करेगा, साथ ही व्यावसायिक भारतीय बैंको में नकदी-प्रवाह (Liquidity) में विशालकाय वृद्धि कर देगा।
यह मौका सच में ‘स्वर्ण’ (Golden) अवसर है या सिर्फ छलावा?
क्या असल में यह एकदम एक शानदार और पूर्ण नीति है या एक बहुत बड़ा आर्थिक राष्ट्रीय प्रयोग है? यदि आपके पास एकदम शुद्ध और काफी वज़न वाले पुराने सोने के बिस्कुट मौजूद हैं, वो बिना किसी इस्तेमाल के पड़े हुए सिर्फ धातु के टुकड़े हैं, या फिर बहुत ज्यादा खण्डित रूप की चेन हैं जिनका शायद कोई भी अब असल पहनावे में भविष्य में कोई इस्तेमाल करने नहीं जा रहा—तो जी हां, GMS एक बेहतरीन योजना और पैसा बनाने की अंतिम शानदार विधि हो सकती है।
हालांकि इसमें नुकसान की भी सच्चाई जान लें—जांचने वाली बैंक-व्यवस्था के अंदर नियम के रूप में शुद्धता नापते वक्त वह पूरा सोना हमेशा पिघलाया ही जाता है। जिस दिन वह समय अवधि समाप्त होकर परिपक्व (Matchure) हो जाएगी आपको बिल्कुल ताजे शुद्ध रूप वाले सिक्के या पैसे मिलेंगें—न कि वे बारीकी वाले नक्काशीदार गहने जो आपकी पिछली पुश्त से आए थे। इसलिए साफ शब्दों में समझाएं तो अगर उनमें ढेर सारी यादों वाली पुरानी भावनायें, आपकी कुल की संपत्ति का एहसास छिपा हुआ है तो यह फैसला ठीक ना होगा। लेकिन यदि उद्देश्य पूर्णतः पैसे और संपत्ति (wealth) बढ़ाना है, तो ये एकदम आपका अचूक निर्णय बनेगा।
समाज के लिए विशेष संदेश
केवल खौफ़ या आशंका की भावना की जंजीर से जकड़े हुए धन को हम अपनी अगली पीढ़ी की वृद्धि या समृद्धि का माध्यम कतई नहीं बना सकते। सदियों पुरानी, हमारे घरों और पुरखों से मिलती आ रही वस्तुओं से इस तरीके का भारी और अति-संवेदनशील भावनात्मक लगावा प्राकृतिक ही है। मगर असली और बड़ी समझदारी हमें तभी हासिल होगी, जब अपनी परंपरा और सुरक्षित नए स्मार्ट-फ्यूचर के बिल्कुल संतुलित और सँभले-रखे हुए रिश्ते को अच्छी तरह से जानें और समझें। यह घर का पैसा और संपत्ति तब काम आएगी, जब या तो मेडिकल पढाई करने वाली अगली-बढ़ती उम्र में धन आएगा और या यही चीज पूरी तेजी से चल रही उस महान राष्ट्र-प्रगति के देश-सुधार में काम आ पाएगी। अब एक ऐसी स्थिति निर्मित होनी चाहिये जिससे यह पैसा घरों के बक्सों के कोने में रखा हुआ सड़ ना जाये बल्कि सबके कल्याण वाली जगह में पूरी समझदारी से इन्वेस्ट किया जा सके!
सामान्य अस्वीकरण (Standard Disclaimer): इस पूरे लेख (आर्टिकल) में उपयोग में ली गई तमाम बातें पूर्णतया और 100% केवल जनकारी प्राप्त करने, एवं आधारभूत स्तर वाली शिक्षा और सूझ-बूझ बढ़ाने वाले मक़सद के तौर पर बनाई गई है। कृपया इन लिखित-बातों के लिए ये अर्थ बिलकुल नहीं लिया जाए कि हमने व्यावसायिक टैक्स विशेषज्ञ (Certified Taxation and licensed) की श्रेणी वाला प्रमाणिक निवेश मार्गदर्शन या आर्थिक एडवाइज़ प्रदान की है। हर व्यक्तिगत-घर व परिवारों में वित्त (Finance) एकदम अलग और अलग-रुप के नियम मांगता है अतः कोई कड़ा व्यावहारिक कदम खुद भी अमल करने के पहले कृपया बैंकों से मान्यता प्राप्त पेशेवरों एवं लाइसेंस्ड वित्तीय एजेंट की सटीक पेशेवर समझ, सलाह और जानकारी के बगैर लागू न किया जाए! सभी वाक्यों को अत्यधिक सरल व पठनीय समझने योग्य इसलिए प्रस्तुत किया गया है ताकि इसकी समझ स्पष्ट हो पाए!






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