Please click here to read this in English
क्या हुआ है अभी?
12 जून 2025 को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025 जारी की, जिसमें दुनिया के 148 देशों को चार प्रमुख क्षेत्रों में लैंगिक समानता के आधार पर रैंक किया गया:
- आर्थिक भागीदारी और अवसर (Economic Participation & Opportunity)
- शैक्षणिक उपलब्धि (Educational Attainment)
- स्वास्थ्य और जीवन (Health & Survival)
- राजनीतिक सशक्तिकरण (Political Empowerment)
भारत 129वें स्थान से फिसलकर 131वें स्थान पर पहुंच गया, जबकि उसका कुल स्कोर 64.1% से बढ़कर 64.4% (0.644) हो गया। यह गिरावट भारत के प्रदर्शन में गिरावट नहीं बल्कि अन्य देशों की तेज़ प्रगति का परिणाम है।
भारत बनाम वैश्विक औसत
- भारत: 64.1% → 64.4%, वैश्विक औसत: 68.8%, भारत अब भी वैश्विक औसत से काफी पीछे है।
- शीर्ष प्रदर्शनकर्ता: आइसलैंड: 92.6% समानता के साथ पहले स्थान पर, उसके बाद: फिनलैंड, नॉर्वे, यूके, न्यूज़ीलैंड
भारत कहां अच्छा कर रहा है
- शैक्षणिक उपलब्धि – 97.1%, रैंक ~110, महिला साक्षरता और उच्च शिक्षा में भागीदारी के चलते लगभग पूर्ण समानता हासिल
- स्वास्थ्य और जीवन – ~95%, रैंक ~140, जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार और “स्वस्थ जीवन प्रत्याशा” में वृद्धि, हालांकि कुल जीवन प्रत्याशा में थोड़ी गिरावट आई है
भारत कहां पिछड़ रहा है
1. आर्थिक भागीदारी और अवसर – 40.7%, रैंक 144, भारत दुनिया में सबसे निचले प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल. मुख्य कारण:
- महिला श्रम बल भागीदारी 45.9% पर स्थिर
- महिलाएं पुरुषों की तुलना में केवल 30% कमाती हैं – स्पष्ट वेतन अंतर
- वरिष्ठ और तकनीकी पदों में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम
2. राजनीतिक सशक्तिकरण – सिर्फ 0.245, रैंक ~69, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में गंभीर गिरावट
- महिला सांसदों की संख्या: 14.7% → 13.8%
- महिला मंत्रियों की संख्या: 6.5% → 5.6%, यह भारत की सबसे कमजोर कड़ी बनी हुई है
भारत बनाम दक्षिण एशिया
- बांग्लादेश: 24वें स्थान पर पहुंचा (पिछले वर्ष की तुलना में 75 स्थान ऊपर)
- भूटान – 119, नेपाल – 125, श्रीलंका – 130, भारत – 131, मालदीव – 138, पाकिस्तान – 148 (आखिरी स्थान)
क्यों यह महत्वपूर्ण है — और इसका क्या मतलब है?
- सामाजिक प्रभाव: यह अंतर बताता है कि पितृसत्ता, लैंगिक पूर्वाग्रह, और महिलाओं की गरिमा व सुरक्षा को लेकर समस्याएं बनी हुई हैं। महानगरों में भी कई महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करती हैं।
- आर्थिक लागत: भारत को हर साल लगभग 770 अरब अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है। महिलाओं को कार्यबल से जोड़ना उत्पादकता, नवाचार, और GDP को बढ़ा सकता है।
- राजनीतिक असर: महिलाओं की कम प्रतिनिधित्व से निर्णय-निर्माण में विविधता घटती है। जनता का शासन में विश्वास भी कम होता है।
संक्षिप्त इतिहास
ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स की शुरुआत 2006 में हुई थी, जो वैश्विक लैंगिक प्रदर्शन का मानक बन गया। भारत ने कभी 127वां स्थान (2023) तक सुधार किया था, लेकिन अब स्थिति फिर से बिगड़ रही है।
समाधान क्या हो सकते हैं?
- महिलाओं की कार्य भागीदारी बढ़ाने के लिए: कौशल प्रशिक्षण, मातृत्व अधिकार, लचीले कार्य घंटे, वर्क फ्रॉम होम (WFH) को बढ़ावा
- 33% राजनीतिक आरक्षण को लागू करना, जिसे संसद ने पारित किया है पर अभी अमल नहीं हुआ
- सुरक्षा और उत्पीड़न विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना: फास्ट-ट्रैक कोर्ट, महिला पुलिस बलों का विस्तार
- स्कूल पाठ्यक्रम में लैंगिक संवेदनशीलता को शामिल करना, बेटी बचाओ… जैसी योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावशाली बनाना
- जेंडर-बेस्ड बजटिंग और सभी योजनाओं का गंभीर मूल्यांकन
आगे क्या?
WEF के अनुसार, मौजूदा गति से वैश्विक लैंगिक समानता हासिल करने में 123 साल लगेंगे
— यानी पूरी समानता 2148 तक ही आएगी। भारत को अब कदम उठाने होंगे— नहीं तो हम क्षेत्रीय और आर्थिक रूप से और पीछे छूट सकते हैं।
संक्षेप में
भारत का स्कोर मामूली बढ़ा जरूर है, लेकिन गंभीर समस्याएं अभी भी मौजूद हैं: आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण में भारत अभी भी काफी पीछे है। वहीं, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी देश तेजी से आगे निकल रहे हैं। आगे का रास्ता साहसिक नीतियों, सामाजिक बदलाव और सटीक क्रियान्वयन से ही निकलेगा।







Leave a Reply