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भारत की कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स ने 30 अप्रैल 2025 को आगामी दशक गैरिक जनगणना में व्यापक जाति गणना को शामिल करने को मंजूरी दे दी है, जो 1941 के बाद पहली बार ऐसा होगा और पिछले चार दशकों की इस छूट को पलट देगा। मूलतः 2021 की जनगणना से यह कार्य महामारी और तात्कालिक चुनौतियों के कारण स्थगित हुआ था। इस नये जाति जनगणना में केवल अनुसूचित जातियाँ (SC) और अनुसूचित जनजातियाँ (ST) ही नहीं, बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सैकड़ों व्यक्तिगत जातियों का भी डेटा एकत्र किया जाएगा, जिससे भारत के जटिल सामाजिक ढांचे की सूक्ष्म समझ प्राप्त होगी। समर्थक दलों का मानना है कि इस सर्वेक्षण के परिणाम आरक्षण नीतियों को फिर से आकार देंगे और शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा की समीक्षा पर दबाव डालेंगे। राजनीतिक रूप से इस कदम ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस के बीच ‘क्रेडिट वॉर’ शुरू कर दिया है—जहाँ BJP इसे “समान और लक्षित” शासन की दिशा में एक कदम बताती है, वहीं कांग्रेस इसे पूर्ण जाति सर्वेक्षण के पक्ष में अपनी लंबी लड़ाई का परिणाम मानती है।
पृष्ठभूमि: भारत में जनगणना और जाति
भारत में जनगणना 1872 से प्रत्येक दस वर्ष में होती रही है, लेकिन जाति गणना systematic रूप से केवल 1941 तक ही शामिल की गई थी। स्वतंत्रता के बाद 1951 की जनगणना में केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों का डेटा इकट्ठा किया गया; अन्य पिछड़ा वर्ग को राजनीतिक संवेदनशीलता और गोदने की जटिलता के कारण बाहर रखा गया। बिहार, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों ने 2022 में अपने स्तर पर जाति सर्वेक्षण किए, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली और पारदर्शिता में बड़े अंतर रहे, जिसने एक统一 राष्ट्रीय सर्वेक्षण की मांग को बल दिया।
जाति जनगणना क्या है?
- कार्यक्षेत्र: गणक (enumerators) प्रत्येक व्यक्ति से उनकी स्वयं-घोषित जाति, उप-जाति और धार्मिक पहचान संबंधी जानकारी लेंगे, जिसमें सामान्य वर्ग, SC/ST, OBC और अन्य सभी श्रेणियाँ शामिल होंगी।
- प्राधिकरण: गृह मंत्रालय ने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन पॉलिटिकल अफेयर्स की सिफारिश पर, 30 अप्रैल 2025 को इस निर्णय को आधिकारिक मंजूरी दी, और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसे “निष्पक्ष और लक्षित नीतियों” की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया।
- समय-सीमा: सरकार ने अभी ठोस तारीखें घोषित नहीं की हैं, लेकिन मान्यता है कि अगली जनगणना सामान्य दशक चक्र के अनुरूप, संभवतः 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत में आयोजित होगी।
राजनीतिक मायने
- BJP बनाम कांग्रेस: BJP इसे अपने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सहयोगियों के दबाव का नतीजा बता रही है, जबकि कांग्रेस का दावा है कि उसने वर्षों से विधायी स्तर पर इस पूर्ण जाति सर्वेक्षण की मांग की है।
- गठबंधन दबाव: OBC-प्रधान राज्यों जैसे बिहार और उत्तर प्रदेश के NDA सहयोगी दलों ने विस्तारक आरक्षण के समर्थन में राष्ट्रीय-स्तरीय जाति गणना की मांग की थी।
- चुनावी गणित: बिहार (2025) समेत महत्वपूर्ण राज्य चुनावों से पहले यह जातिगत आंकड़ा राजनीतिक दलों की रणनीतियों और वोटर आउटरीच योजनाओं को पूरी तरह बदल सकता है।
सामाजिक–आर्थिक महत्व
- आरक्षण सुधार: OBC और अन्य पिछड़ी जातियों की विस्तृत गिनती से 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा बढ़ाने की संवैधानिक बहस को नया तर्क मिल सकता है।
- लक्ष्यित कल्याण योजनाएँ: सूक्ष्म जातिगत आंकड़ों से छात्रवृत्ति, कृषि अनुदान, ग्रामीण विकास योजनाओं जैसे कल्याण कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी ढंग से लक्षित किया जा सकेगा।
- कॉर्पोरेट DEI: विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉर्पोरेट इंडिया को ‘DEI’ (Diversity, Equity & Inclusion) पहलों में जाति-आधारित मापदंडों को शामिल करना चाहिए, क्योंकि निचली जातियाँ वरिष्ठ पदों पर अब भी उप-प्रतिनिधि हैं, हालांकि संवैधानिक रूप से जाति आधार पर भेदभाव अवैध है।
ऐतिहासिक संदर्भ और पूर्ववर्ती प्रयास
- 1941 की जनगणना: यह अंतिम ऐसा अवसर था जब ब्रिटिश शासन के तहत सभी जातियों का राष्ट्रीय स्तर पर सर्वेक्षण हुआ था।
- SECC 2011: सामाजिक-आर्थिक और जाति संबंधी सूक्ष्म डेटा तो एकत्र हुआ, पर जाति के स्तर पर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं मिली।
- राज्य सर्वेक्षण: बिहार (2022) ने OBC को लगभग 36 प्रतिशत दिखाया, जो केंद्रीय अनुमानों से काफी अधिक था; इसने राष्ट्रीय सत्यापन की मांग को गति दी।
प्रमुख व्यक्ति
- नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री): कैबिनेट कमेटी की अध्यक्षता की।
- अश्विनी वैष्णव (सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री): निर्णय की घोषणा की और इसे “निष्पक्ष नीति” करार दिया।
- अमित शाह (गृह मंत्री): इस कदम को “इतिहासिक” करार दिया।
- राहुल गांधी (कांग्रेस नेता): सरकार पर स्पष्ट समय-सीमा तय करने का दबाव डालते हुए इस निर्णय का स्वागत किया।
क्यों महत्वपूर्ण है
पहली बार आठ दशक में उपलब्ध यह सूक्ष्म जातिगत तस्वीर भारत की सामाजिक बनावट पर नए सिरे से प्रकाश डालेगी। इससे योजनाओं की प्राथमिकताएँ फिर से तय होंगी, कॉर्पोरेट हायरिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी, और राजनीतिक रणनीतियाँ बदलेंगी। सर्वेक्षण का मात्र प्रतीकात्मक महत्व भी है—यह हर समुदाय की भारतीय राष्ट्रकथा में पहचान का अधिकार सुनिश्चित करता है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल जानकारी हेतु प्रस्तुत किया गया है और किसी भी प्रकार की विधिक, वित्तीय या व्यावसायिक सलाह नहीं है। 1 मई 2025 तक सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित सभी डेटा और जानकारी भविष्य में सरकारी या राजनीतिक निर्णयों के आधार पर बदल सकती है। यथासंभव सटीक जानकारी देने का प्रयास किया गया है, परंतु शुद्ध मार्गदर्शन के लिए मूल सरकारी अधिसूचनाएँ, आधिकारिक प्रकाशन या योग्य पेशेवरों से परामर्श करें। हम सभी समुदायों, जातियों एवं धर्मों की भावनाओं का सम्मान करते हैं; हमारे प्रकाशक तथा लेखक किसी भी त्रुटि, चूक या निष्कर्ष हेतु उत्तरदायी नहीं होंगे।







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