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क्या हुआ?
कोटा स्थित ICICI बैंक की डीसीएम शाखा में रिलेशनशिप मैनेजर के पद पर कार्यरत 26 वर्षीय साक्षी गुप्ता ने साल 2020 से 2023 के बीच लगभग ₹4.58 करोड़ की धोखाधड़ी की। यह रकम 41 व्यक्तियों के 110 से अधिक खातों से निकाली गई। यह कोई छोटी-मोटी चोरी नहीं थी—बल्कि यह एक सुनियोजित फर्जीवाड़ा था, जिसमें उन्होंने फिक्स्ड डिपॉजिट्स (FDs) तोड़े, ओवरड्राफ्ट सुविधाएं चालू कीं, फर्जी ऋण दिए और सारा पैसा डिमैट खातों के जरिए स्टॉक मार्केट में लगा दिया—वह भी ग्राहकों की जानकारी और सहमति के बिना।
उन्होंने यह कैसे किया?
- चुपचाप निकासी: ICICI बैंक के ‘यूज़र FD’ लिंक का उपयोग कर उन्होंने ₹1.34 करोड़ से अधिक की फिक्स्ड डिपॉजिट्स समय से पहले बंद कर दीं।
- ओवरड्राफ्ट का दुरुपयोग: लगभग 40 खातों में ओवरड्राफ्ट सुविधाएं सक्रिय कर दीं और अपने या अपने संपर्कों के नाम पर ₹3.4 लाख तक के ऋण जारी किए।
- डिजिटल धोखाधड़ी: ग्राहकों के पंजीकृत मोबाइल नंबरों को अपने रिश्तेदारों के नंबरों से बदल दिया ताकि OTP और अलर्ट्स को इंटरसेप्ट कर सकें। बैंक की आंतरिक प्रणाली जैसे इंस्टा कियोस्क, इंटरनेट बैंकिंग, डेबिट कार्ड आदि का दुरुपयोग कर लेन-देन को छिपाया।
- भूतिया खाता: एक वरिष्ठ नागरिक के खाते को एक तरह से ‘पूलिंग ग्राउंड’ बनाया गया, जहां से ₹3 करोड़ से अधिक की रकम गुजारी गई ताकि ट्रैक को मिटाया जा सके।
क्यों किया शेयरों में निवेश?
साक्षी गुप्ता को शेयर ट्रेडिंग में गहरी रुचि थी—या कहें एक जुनून था। उन्होंने सारी हड़पी हुई रकम को स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, खासकर Zerodha और ICICI Direct जैसे F&O (फ्यूचर्स और ऑप्शन्स) प्लेटफॉर्म पर। दुर्भाग्यवश, लगभग पूरी ₹4 से ₹4.6 करोड़ की राशि बाजार में डूब गई।
घोटाला कैसे उजागर हुआ?
जब एक ग्राहक को ₹1.5 लाख की FD गायब मिली, तब उन्होंने शिकायत दर्ज कराई। इस पूछताछ के बाद बैंक ने आंतरिक ऑडिट शुरू किया। शाखा प्रबंधक ने 18 फरवरी 2023 को एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद 31 मई 2025 को साक्षी को उनकी बहन की शादी में गिरफ्तार किया गया।
कानूनी और संस्थागत परिणाम
- गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत: कोटा पुलिस के कुशल अधिकारियों, जैसे सब-इंस्पेक्टर इब्राहिम खान और एसपी दिलीप सैनी, अब संभावित साथियों की जांच कर रहे हैं। साक्षी को न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।
- बैंक की प्रतिक्रिया: ICICI बैंक ने तत्काल कार्रवाई की—एफआईआर दर्ज कराई, साक्षी को सस्पेंड किया, ग्राहकों के वैध दावों का भुगतान किया और संपूर्ण प्रणाली की सुरक्षा कड़ी करने का वादा किया।
ज़मीनी सच्चाई: प्रभावित ग्राहकों की आवाज़
पीड़ितों में से एक, रामलाल सुमन ने बताया:
“मैं साक्षी गुप्ता से कई बार मिला… मुझे कभी कोई ट्रांजैक्शन से संबंधित मैसेज नहीं आया। जब मैंने बैंक स्टेटमेंट चेक किया, तभी शाखा प्रबंधक ने बताया कि मेरे साथ धोखाधड़ी हुई है।”
मूल कारण और व्यापक प्रभाव
- आंतरिक गड़बड़ी: यह घोटाला दर्शाता है कि कैसे भरोसेमंद कर्मचारी भी प्रणाली की कमजोरियों का फायदा उठा सकते हैं।
- प्रक्रियात्मक खामियां: रियल‑टाइम अलर्ट की कमी, कमजोर आंतरिक ऑडिट प्रक्रियाएं, और OTP की सुरक्षा व्यवस्था में खामियां इस फर्जीवाड़े को आसान बना गईं।
- असुरक्षित ग्राहक: वरिष्ठ नागरिकों को खास तौर पर निशाना बनाया गया, जो तकनीकी रूप से जागरूक नहीं होते।
- सट्टा संस्कृति: F&O ट्रेडिंग में जल्दी मुनाफा कमाने का लालच शायद गुप्ता जैसे बैंकिंग पेशेवरों की समझदारी पर भारी पड़ गया।
यह घोटाला अतीत की यादें ताज़ा करता है—1992 का हर्षद मेहता घोटाला हो या PNB‑नीरव मोदी का ₹14,000 करोड़ का घोटाला—हर बार संरचनात्मक विफलताएं उजागर होती हैं और नियामक बदलाव की मांग उठती है।
एक विचित्र मोड़
कल्पना कीजिए: करोड़ों चुराए, सिर्फ इसलिए कि शेयर टिप्स का पीछा किया जाए—और वह भी ऐसे गायब हो जाएं जैसे रविवार की योजनाएं! एक युवा प्रोफेशनल—जो फाइनेंस की पढ़ाई कर चुकी थी—ने सोचा कि लोगों की मेहनत की कमाई की एफडी तोड़कर शेयर बाज़ार में पैसा लगाना एक अच्छा आइडिया होगा। लेकिन नतीजा? पूरी तरह बर्बादी—न लाभ, न सम्मान, न आज़ादी।
सारांश में:
- समयकाल: 2020–2023, घोटाला फरवरी 2023 में उजागर, गिरफ्तारी 31 मई 2025
- परिमाण: ₹4.58 करोड़ की धोखाधड़ी, 41 पीड़ित, 110 से अधिक एफडी
- तरीका: एफडी तोड़ना, ओवरड्राफ्ट दुरुपयोग, ऋण धोखाधड़ी, मोबाइल/OTP में हेराफेरी
- परिणाम: सारा पैसा शेयर मार्केट में लगाया गया—और गंवा दिया गया
- बाद की स्थिति: बैंक ने ग्राहकों को भुगतान किया; पुलिस अब भी जांच में जुटी है







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